Song 2. क़ुर्बतो के फ़साने में हम फ़ासलो का जमाना भूले हैँ...
क़ुर्बतो के फ़साने में
हम फ़ासलो का जमाना भूले हैँ,
तेरी सूरत अब भी याद है मुझको
बेशक, हम अपना ही साया भूले हैँ… ……१
मुफ़लिसी के दौर में
चराग अपने आशियाँ में जलाना भूले हैं,
हर शब रोशन की है तेरी
बेशक, हम अपना ठिकाना भूले हैं………२
एक तेरी चाह में
हम सारा ये जहां ये जमाना भूले हैं,
तू हूबहू याद है मुझको
बेशक, हम खुद में लौट आना भूले हैं………३
अश्कों के काफ़िलों में
हम आँखों का मुहाना भूले हैं,
तुझसे नजर हटती नहीँ
बेशक, हम खुद सँवर जाना भूले हैं……..४
तेरी इबादत की आयतों में
हम अपना – बेगाना भूले हैँ,
तेरी खिदमत में कोई कमी न की
बेशक, हम मन्दिर-ओ-मस्जिद जाना भूले हैं……..५
तेरे हर हर्फ़ को हकीकत समझ
हम अपनी इबारतों को दोहराना भूले हैँ,
जो तूने कहा वो किया मैने
बेशक, हम खुद के करीब आना भूले हैँ………६
रात सर्द हवाओं में
हम खुद भी सिहर जाना भूले हैँ,
तुझे तकलीफ हो ये मंजूर न हुआ
बेशक, हम खुद की जरूरतों को पाना भूले हैँ……..७
तेरी ख़ुदाई में ऐ मेहरम
हम खुदी को मनाना भूले हैँ,
तेरी हर जिद हकीकत में बदली है हमने
बेशक, हम अपनी चाहतों पे जान लुटाना भूले हैं……..८
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