Blog चाहो तो चन्द साँसों की रिश्वतें ले लो...
चाहो तो चन्द साँसों की रिश्वतें ले लो, एक वस्ल को मग़र तुम इनकार मत करो.....१ बेमौत मर जायेंगे हम तेरे तसव्वुर में, यूँ इस कदर हमको अपना तलबगार मत करो......२ हो न सकेगी मेरी मौजूदगी फिर बज़्म में तेरी, यूँ मेरे सामने किसी और को अपना हमराह मत करो....३ और आता ही क्या है मोहब्बत के सिवाय, यूँ शरेआम बेवफ़ा कह कर मुझको गुनहगार मत करो...४ बोझ सह न पायेंगे हम तेरी इनायत का, पहले से ही फ़क़ीर हूँ और लाचार मत करो........५ ज़िन्दगी गुज़र जाये मेरी फाके में बेशक़, बेईमान कह कर यूँ मेरा तिरस्कार मत करो.......६ लफ़्ज़ दर लफ़्ज़ लिखेंगे हम तुमको, किसी गैर की ग़ज़ल बनने का इंतज़ार मत करो......७ एक रोज़ ज़रा क़रीने से हम तेरे जूड़े को गूंथेंगे, यूँ ज़ुल्फ़ लहराकर मेरी नींदे हराम मत करो........८ यूँ तो साथ देने को गैर भी अमादा हैँ तेरा, बेवज़ह, मेरे रक़ीबों को इतना आराम मत करो......९ तेरी हर नज़र का कायल हुआ बैठा है जमाना, सरका के रुख़ से परदा ख़ुद को शरे-आम मत करो....१०