Song बिखरे हैँ शबनम के जैसे...

बिखरे हैँ शबनम के जैसे
तेरे लबों से निकले हुये ये साज,
दिल चाहे चुन लूँ सारे
घुँघरू से बजते हुये तेरे अल्फ़ाज,
कानों में घुलती जाये
चाहत सी बढ़ती जाये
दे जाये सुकूँ के एहसास,
तेरी आवाज़
तेरे अल्फ़ाज..........ooo मेरे मेहताब
मौसम भी बदल रहा है
अपने मिज़ाज
तेरा आगाज़..... मेरे मेहताब,
साँसों ने भी बदल लिया
अपना अन्दाज....... मेरे मेहताब
घना कोहरा जैसे कहीँ पे छा रहा,
तेरे सिवाय कुछ भी नजर नहीँ आ रहा,
बेक़रारी बेसबब बढ़ रही,
तुझे छूने को दिल मचल रहा,
बन्दिशें सारी हटा दो
मुझपे से आज, मेरे मेहताब
ऐसा लगता है
जैसे फ़िजा में घुल रहे,
तेरे अल्फ़ाज....... मेरे मेहताब
तू नहीँ है यहाँ तो क्या हुआ,
तेरे लिये ही तो है मेरी हर दुआ,
चाहत मेरी बन कर जुगनू
चमके गगन में जैसे
बना रहे हों तुझ सा नक़ाब, मेरे मेहताब
रातों को नींदे भी
लेकर आती हैँ
बस तेरे ही ख्वाब.......मेरे मेहताब
साँसों की गर्मी से जैसे
जिस्म मेरा पिघल रहा,
सब कुछ है पहले जैसा
फिर क्योँ मन मेरा मचल रहा,
ऐसा लगता है जैसे
तू मुझमें है मिल रहा,
गुलो के रँग, बढ़ती उमंग
बेदम साँसे, जैसे लड़ी हो कोई जंग,
सब ही तो लगते ऐसे
जैसे हक़ीक़त में बदल रहा हो
मेरा ख़्वाब...... ooooo मेरे मेहताब
बढ़ने दो चाहत को ऐसे
उड़ रहे हों आसमान में पँछी जैसे,
सजने दो हया को लबों पे ऐसे
हों कलियाँ सुर्ख गुलों की जैसे,
अंधेरो से डर जाओ जब
लिपटो तुम मुझसे ऐसे
जैसे मैं जिस्म हूँ और तुम साँस, मेरे मेहताब
मिल जाने दो एक दूजे में हमको
बुझने दो सदियों की लम्बी ये प्यास......मेरे मेहताब

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